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जीवनके मेला

5 महीना पहिले प्रकाशित

Akul Prasad Sah

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           कविता

लेखक ः भोला यादब


भौतिक वाद जीवनके मेला,
फेरब हम अधम चोला ।
लाख जतन केली अई तनसँ,
फेरब हम अधम चोला ।।

                    रामक नाम मनमे नै आबे,
                    श्याम भजनस चित भटकाबे ।
                    मनके चोर बहुत रस रंगी,
                    रंग विरंग सपना लावे ।
                    छन् छन् व्याकुल मन भटकावे ।
                    किए झेलव भंmझट झमेला,
                    फेरब हम अधम चोला ।

अमृत आस विषसँगे पिवैछी,
भक्तिसँगे काम, व्रmोध लावै छी ।
मन पापी तन पाप करैए,
सत्य वचन सँ दुर भगैए,
मन पापी बलजोरी करैए,
किए खेबव हम पापक नैयाँ,
फेरब हम अधम चोला ।

                     मित्र, भाइसँग समाजछै बैरी,
                     छन् छन् मनमे ठेँस पुगाबे ।
                     साधु जनसंग गुरुजन बैरी,
                     झुठ फुसके मंत्र पढाबे ।
                     मंदीर, मस्जीद, भगवान छै बैरी,
                     सत्य वचनसंग बोल न पावे ।
                     वेद पुरानसंग सत्य अकेला,
                     फेरब हम अधम चोला ।

 

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