कविता

हिन्दी कबिता

“अकिदा और हम“अकायदों के घरोंदे बिखर रहे हैं ,सडकों पे इधर उधर जहाँ तहाँ बिखर रहे हैं मुझको अंदेशा है –––बादशाहों की कोई दुसरी किरदार हामारे उपर थोपे जा रहे हों,मेरी मुखालिफत है और खौफ ..